
रामहृद तीर्थ - पवित्र विरासत
रामहृद तीर्थ जींद से 8 किलोमीटर की दूरी पर पश्चिम में जींद-हांसी राजमार्ग पर गाँव रामराये में स्थित है
ऐतिहासिक महत्व
यहाँ पर भगवान परशुराम के पाँच कुण्ड हैं, जिनमें भगवान परशुराम ने प्रजातन्त्र व्यवस्था स्थापित करने में हुए मुक्ति युद्ध में हताहत हुए राजा महाराजाओं की मुक्ति के लिए तर्पण किया था। ये भगवान परशुराम के पवित्र तीर्थ हैं।
कुरुक्षेत्र की सीमाएं
महाभारत के वनपर्व के अनुसार कुरुक्षेत्र भूमि के चारों द्वारों का वर्णन: "तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरम् रामह्रदानांच मचक्रुकस्य च। एतत्कुरुक्षेत्रसमन्तपंचकम् पितामहस्योत्तरवेदिरुच्यते॥"
अरन्तुक
सींक गाँव के पास, पानीपत
रामहृद (रामयक्ष/कपिल यक्ष)
रामराये
कुरुक्षेत्र का दक्षिणी द्वार
मचक्रुक
बहर पसौल, पटियाला, पंजाब
तरन्तुक
थानेसर, कुरुक्षेत्र
कुरुक्षेत्र का विस्तार
12 योजन (48 कोस) = लगभग 96 मील
पवित्र कुण्ड
कृत शौच (कल्याणी) सन्निहित सरोवर तथा भगवान परशुराम के पाँच कुण्डों का समष्टि रूप "स्यमन्त पंचक तीर्थ" है। इसमें प्रत्येक पूर्णिमा को हजारों लोग दूर-दराज से स्नान के लिए आते हैं।
कृत शौच (कल्याणी)
पवित्र स्नान सरोवर
भगवान परशुराम के पाँच कुण्ड
भगवान परशुराम द्वारा निर्मित अनुष्ठान कुण्ड
सूर्यकुण्ड
सूर्य कुण्ड
गोविन्द कुण्ड
गोविन्द कुण्ड
राजपुत्र कुण्ड
राजपुत्र कुण्ड
शास्त्रीय संदर्भ
महाभारत
वनपर्व में कुरुक्षेत्र की सीमाओं का वर्णन
रामहृद को कुरुक्षेत्र के दक्षिणी द्वार के रूप में उल्लेख
श्रीमद्भागवत महापुराण
दशम स्कन्ध, 82वें अध्याय में भगवान कृष्ण के आगमन का वर्णन
सूर्य ग्रहण के दौरान भगवान कृष्ण की यात्रा का वर्णन
वामन पुराण
तीर्थयात्रा वर्णन में रामहृद का माहात्म्य
रामहृद की तीर्थयात्रा के महत्व का वर्णन
स्कन्द पुराण
कुरुक्षेत्र के दक्षिणी द्वार का विवरण
कुरुक्षेत्र की दक्षिणी सीमा के बारे में विवरण
ब्रह्मवैवर्त पुराण
परशुराम तीर्थों का वर्णन
भगवान परशुराम द्वारा निर्मित पवित्र तीर्थों का उल्लेख
नारद पुराण
तीर्थों की महिमा
पवित्र तीर्थों की यात्रा के आध्यात्मिक लाभों का वर्णन
पद्म पुराण
स्नान एवं दान का माहात्म्य
पवित्र स्थानों पर स्नान और दान के पुण्य का वर्णन
भगवान कृष्ण का आगमन
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार द्वापर युग में सूर्य ग्रहण के अवसर पर भगवान श्री कृष्ण यादवों सहित द्वारिका पुरी से रामराय के समन्त पंचक तीर्थ में स्नान करने आये तथा सभी ने यज्ञ दानादि किये।
पुनर्मिलन
बाबा नन्द और वसुदेव, यशोदा मैया और देवकी, राधा जी और गोपियाँ, वृषभानु और अन्य यादव - यह पुनर्मिलन भगवान कृष्ण के जीवन की महत्वपूर्ण घटना थी जो रामहृद की पवित्रता को दर्शाता है।
पाण्डवों की तीर्थयात्रा
महाभारत युद्ध में विजय के बाद पाण्डवों ने तीर्थयात्रा की। वे रामहृद के भगवान परशुराम के तीर्थों में स्नान व तर्पण के लिए आए।
युद्ध में हुई हिंसा के प्रायश्चित हेतु
यक्षी देवी मंदिर
रामराये में कपिल यक्ष अथवा रामयक्ष के साथ उलूखल मेखला यक्षी देवी का प्राचीन महाभारत कालीन मंदिर है।
यक्षी देवी दक्षिणी कुरुक्षेत्र सीमा की रक्षा करती हैं। वामन पुराण और महाभारत दोनों में इस देवी का वर्णन मिलता है।
यक्षी देवी और कपिल यक्ष कुरुक्षेत्र की चारों दिशाओं की रक्षा के लिए दुन्दुभि बजाकर सीमाओं की रक्षा करते हैं।
पूर्णिमा मेला
रामहृद में प्रत्येक पूर्णिमा को हजारों श्रद्धालु दूर-दराज से स्नानार्थ आते हैं।
महाराजा कुरु की धर्म खेती
यहीं पर महाराजा कुरु ने बिहार के गया से आकर भगवान शिव के बैल तथा यमराज के पौण्ड्रक भैंसे को सोने के हल में जोतकर धर्म की खेती की। अतः इसी क्षेत्र को कुरुक्षेत्र नाम से पुकारा जाता है।
कुरुक्षेत्र = कुरु की भूमि = धर्म की भूमि
भगवद्गीता के प्रथम श्लोक में: "धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः" - यह कुरुक्षेत्र को "धर्म क्षेत्र" के रूप में स्थापित करता है जहाँ महाभारत का महान युद्ध लड़ा गया था।
ब्रह्मा की पाँच वेदियाँ
पूर्व
गयाजी (गयाशिर)
बिहार
मध्य
प्रयागराज (इलाहाबाद)
उत्तर प्रदेश
पश्चिम
पुष्करराज (अजमेर)
राजस्थान
दक्षिण
विरजा (उज्जैन)
मध्य प्रदेश
उत्तर
समन्त पंचक - रामराये
हरियाणा
तीर्थ यात्रा के लाभ
पाप मुक्ति
पवित्र स्नान से सभी पापों से मुक्ति
मनोकामना पूर्ति
श्रद्धापूर्वक की गई प्रार्थना पूर्ण होती है
आध्यात्मिक शांति
मन को शांति और आत्मा को सुकून मिलता है
सकारात्मक ऊर्जा
पवित्र भूमि की दिव्य ऊर्जा का अनुभव
अक्षय पुण्य
स्नान, दर्शन, दान से अक्षय पुण्य प्राप्ति
ध्यान एवं साधना
तपोभूमि पर साधना का विशेष लाभ
